Friday, 30 June 2017

लघुकथा


चारा

जानवरों और इंसानों में एक फर्क यह भी है कि जानवरों का मीनू एक ही रहता है, जबकि इंसानों का बदलता रहता है। जैसे गाय-भैंस को घास-भूसा चाहिए तो शेर को मांसाहार। शेर और बकरी कभी भी खाने के लिये आपस में नहीं झगड़ते। जबकि आदमी आदमी से विशेशतः राजनीतिक आदमी आपस में जरूर लड़ते हैं।
चुनाव से पहले राजनीतिक पुरूश का चारा होता है-दलित,किसान ,शहरी गरीब और अल्पसंख्यक। इस भोजन के सहारे वह सत्ता तक पहुंच जाता है। उसी दिन वह अपने इस चारा से मुंह मोड़ लेता है। देखता तक नहीं उसकी तरफ। वह इस चारा को सत्ताविहीनों  के लिये छोड़ देता है।
वाह, सत्ता संपन्न होने पर क्या खाते हैं? 
              रिश्वत,नोट, सरकारी खजाना , जनता का माल...।

(गोविन्द शर्मा)
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया - 335063
जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान)


कचरा

सुनो, तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। एक आदमी ने नया घर खरीदा। घर के साथ ही एक छोटा सा बाग भी था। वह नये मोहल्ले में नये घर में रहने आया। दूसरे ही दिन,उसके देखा- पड़ौस के घर से एक आदमी कचरे का थैला लेकर बाहर आया और उसके घर के सामने फेंक कर चला गया। वह बाहर आया और उसे उठाकर कचरा पात्र में डाल आया। फिर अपने घर से एक टोकरी में अपने बाग के फल भरे। उन्हें लेकर पड़ौसी के घर गया। पड़ौसी ने समझा वह लड़ने आया है। वह भी लड़ने के लिये तैयार हो गया। दरवाजा खोला। उसने फलों की टोकरी आगे करते हुए कहा-फल, आपके लिये है।
उस दिन के बाद उस पड़ौसी ने कभी भी कचरा उसके घर के आगे नहीं डाला। 
यह कहानी विदेश से आई है और मैंने वर्शों पहले पढी थी। मैं इसे आजमा भी चुका हूं। मैंने नये मोहल्ले में नया घर लिया था। मेरे नये घर में अंगूरों की बहुत बेलें थी। पहले ही दिन मेरा एक पड़ौसी मेरे घर के सामने कचरा फेंक गया। मैंने वह साफ कर दिया। अपने घर से अंगूरों की थैली लेकर उसे देकर आया। देखते ही देखते सारे मुहल्ले में इसकी चर्चा हो गई।
‘‘उसके बाद उसने अगले दिन तुम्हारे घर के सामने कचरा नहीं फैंका होगा?’’
कचरा फेंकने के लिये उसे जगह ही नहीं मिली। मोहल्ले के दस -बारह घरों का कचरा मेरे घर के आगे पड़ा था। कचरे की हर ढेरी पर एक पर्ची थी, जिस पर घर का नंबर और गृहस्वामी का नाम भी लिखा था। 

(गोविन्द शर्मा)
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया - 335063
जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान)


इनाम

           वह एक स्थानीय संगठन, जिसे एक बार चंदा, विदेश से मिला था, अपने आपको अंतर्राश्ट्रीय समझने  लगा। पिछले कुछ समय से लोगों को पर्यावरण संरक्षण के कार्य के लिये पुरस्कृत करने लगा है। आज मकरंद भाई पराग भाई को सम्मानित करने का आयोजन था। बड़े बड़े लोगों को बुलाया गया। आम जनता को भी। जनता में से एक रप्पूराम ही पहुंचा।
मकरंद भाई पराग भाई को मंच पर बुलाया गया। उनकी प्रशस्ति में कहा गया-भाई ने अब तक सैंकड़ों लेख पर्यावरण पर लिखे है।। इन्होंने गाइड के रूप में कार्य करके कई को पर्यावरण के विशयों पर पी.एच.डी. करवाई है। इन्होंने कई पौधारोपण कार्यक्रमों की अध्यक्षता की है।आज सुबह ही इन्होंने अपने हाथों से पांच जगह पौधारोपण किया है। इस उपलक्ष में.....।
ठहरिये साहब, पर्यावरण बचाने का इनाम तो मुझे मिलना चाहिए। क्योंकि मैंने...... 
आइए-आइए , आप मंच पर आकर अपनी बात कहिये।
रप्पूराम ने मंच पर आकर बताया कि वह हर वर्ष अपने हाथों से पांच पौधे लगाता है और उनके वृक्ष बन जाने तक अपनी देखभाल करता है। उसके लगाये कई पौधे वृ़क्ष बना चुके हैं।
बहुत बढिया। हम तुम्हें भी इनाम देंगे। अभी मकरंद भाई  पराग भाई को सम्मानित करते हैं।
इसके बाद आयोजक रप्पू राम की तरफ घूमे। उसे कहा गया- तुम बहुत अच्छा काम कर रहे हो। मकरंद भाई पराग भाई ने आज सुबह जो पांच पौधे लगाए हैं उनके वृक्ष बन जाने तक उनकी देखभाल करने की जिम्मेदारी   तुम्हें दी जाती हैं। किसी को जिम्मेदार बनाना बड़ा इनाम होता है।
वह इनाम लेकर बाहर आया तो किसी ने पूछ लिया-कैसा लगा इनाम?
ऐसा कि जैसे कोई कहे-मैंने पांच बच्चे  पैदा तो कर दिये, इनके पाल पोशण अपने से नहीं होता। इसलिये जिम्मेदारी के लिये तुम्हें गोद देता हूं।ध्यान रहे इनके साथ नाम मेरा ही रहेगा।
(गोविन्द शर्मा)
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया - 335063
जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान)



गंदगी

          तीन पुलिस वाले आ गये डिब्बे में। एक ऊपर बर्थ पर पसर गया। बाकी दो ने वसूली शुरूकर दी।  कई थे बिना टिकट। बस एक ईमानदार था। उसके पास टिकट थी। उसकी तलाशी ली गई , पर उसके पास ऐसी वेसी कोई चीज नहीं मिली।
बड़ा गुस्सा आया पुलिस वालो को। यह आदमी ही रहा, मुर्गा नहीं बना। ऊपर लेटे के पास मामला गया। उसे बताया गया कि इनके पास टिकट के अलावा कुछ नहीं है।
कुछ नहीं है?
जेब में एक पैन है।
              इससे पूछो ,शौचालय में गया था। वह खुद ही बोल पड़ा- हां, गया था। कहीं गंदगी नहीं फैलाई। फ्लश भी चलाया था। 
                और वह जो गंदे और अश्लील शब्द लिख रखे हैं,वह तेरे....।
                मैंने नहीं लिखे। मैंने तो ऐसे कई वाक्यों पर पैन चलाकर उन्हें मिटाया है।
              पैन तो चलाया है? अगले स्टेशन पर इसे पैन चलाकर माहौल गंदा करने के आरोप में अपनी चोकी पर ले चलना। कोई छुड़ाने आयेगा , तब सही...।

(गोविन्द शर्मा)
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया - 335063
जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान)

वापसी का टिकट

             वे सब कोच में अपनी अपनी सीट पर बैठ गई। प्लेटफार्म पर खड़े उनके बहू बेटे,पोते हाथ हिलाकर विदा कर रहे थे। कुछ गंगा मइया की जय बोल रहे थे। वे सब तीर्थ यात्रा पर जा रही थी। देखते देखते प्लेटफार्म , स्टेशन ,शहर आझल हो गये। पर बातें बेटे बहुएं की हो रही थी। कुछ बढ चढ कर अपने बेटे बहुओं की तारीफ कर रही थीं। कुछ रामदेई जैसी चुप भी थी। उसे चुप देखकर एक बोली-आज साबित हो गया कि तुम्हारे बेटे बहू तुम्हारी जरा भी परवाह नहीं करते हैं। वरना तुम भी हमारी तरह उनके गुणगान करती नजर आती। वे सोच रहे होंगे- बुढिया से पीछा छूटा...।
रामदेई मुस्करायी और बोली- अच्छा बाबा, तुम्हारे बेटे बहू अच्छे , मेरे बुरे। यह तो बताओ कि तुम वापस कब आओगी। तुम्हारी वापसी का टिकट कब का है?
क्या बात करती हो? जाने का टिकट ही मुश्किल से करवाया। वापसी का टिकट करवाने का वक्त कहां है हमारे बेटे के पास। कह दिया- जहां रहना चाहो, रहो, जितने दिन रहना चाहो, रहो।
रामदेई मुस्कराई और बोली- मेरे बेटे ने जाने के टिकट के साथ ही वापसी का टिकट करवा दिया है। ठीक पन्द्रह दिन बाद का इसी ट्रेन का। बहू ने भी कहा-वापसी का टिकट बदलवाने के चक्कर में मत पड़ना।
अब सभी चुप थीं। चुप तो रामदेई भी थी। पर वह सोच रही थी- घर की रखवाली के लिये उसकी जरूरत न होती तो शायद इनकी तरह उसे भी कहीं रहो, कितने ही दिन रहो, की  छूट मिल जाती।

(गोविन्द शर्मा)
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया - 335063
जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान)

भाई

वह गली से गुजर रहा था। अचानक बड़े से घर पर लिखे नाम पर उसकी निगाह चली गई-गरीब निवास।वह मुस्कराया ही था कि घर का मालिक बाहर निकला। वह उसकी तरफ बढा और बोला - भाई, तुम्हें देखकर बहुत खुशी हुई। तुम गरीब निवास में रहते हो, मैं सदा से गरीबी में निवास कर रहा हूं। हम भाई हैं।
जा-जा, बड़ा आया भाई बनने वाला। मैं हजारों करोड़ का मालिक हूं । यह तो बाप का नाम ही गरीबदास था, इसलिये गरीब निवास लिखना पड़ा।
कुछ दिन बाद शहर चुनाव के तूफान से घिरा हुआ था। वह उसी गली से फिर गुजरा। वही हजारों करोड़ों वाला कुछ लोगों के साथ वहीं खड़ा था। वह उसे देखकर दूसरी तरफ जाने लगा तो वह हजारों करोड़ वाला तेजी से उसके पास आया और बोला-कैसे हो मेरे भाई? याद है न उस दिन इसी गली में हम भाई बने थे? चुनाव में खड़ा हूं....हें...हें... याद रखना। कभी कोई काम हो तो बताना। ठीक है भाई चलता हूं... और भाइयों से भी मिलना है।

(गोविन्द शर्मा)
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया - 335063
जिला हनुमानगढ़ (राजस्थान)






व्यंग्य रचना

फेंकू से पप्पू तक

सबद की चोट लगी मोरे मनल में, बेधि गयो तन सारौ.....यह तो संतकवि ने कहा था। वह चोट अध्यात्मिक थी। उससे दर्द नहीं होता, पीड़ा से मुक्ति मिलती है- ऐसा कहना है प्रवचनकर्त्ताओं का। पर अर्थ का अनर्थ तो राजनीतिक करते हैं। महात्मा गांधी को बापू, नेहरू को चाचा, इंदिरा को अम्मा कहने पर उतना लफड़ा नहीं हुआ, जितना उनके वंशज को पप्पू कहने से हुआ। क्योंकि ‘तुम मेरे कुछ भी बोलने के अधिकार का समर्थन करो, मैं तुम्हारे द्वारा अनचाहा बोलने तक मैं तुम्हारे अधिकार का समर्थन करूंगा’ की नीति वाले स्वयं कुछ भी बोल देते हैं और दूसरे के कुछ भी बोल देने पर नाराज हो जाते हैं।
इधर कुछ दिनों से प्रधानमंत्री को फेंकू कहा जा रहा है। इस पर उनके भक्त नाराज भी होते हे। पहले भक्त सिर्फ भगवान के पास होते थे। अब खुद के बंदों को समर्थक तो दूसरे के समर्थकों को भक्त कह दिया जाता है। भक्त हमेशा शब्दार्थ के अल्पज्ञानी होते है। जबकि फेंकू शब्द तो विशेशण, क्रिया, संज्ञा सब कुछ हैं। यह शब्द किसी को यूं ही नहीं  मिलता। बहुत कुछ करना पड़ता है, इसके लिये। वर्षों से सत्ता में जमी पार्टी को उखाड़ फेंकना कोई आसान काम नहीं होता। उखाड़ फेंका तो नाम मिला फेंकू। शुक्र है उखाड़ू , ऊजाड़ू ,बिगाड़ू या पछाड़ू जैसा आडू. नाम नहीं मिला। इसलिये फेंकू से चिढने की जरूरत नहीं। सारे नेता बयानवीर होते है। अपनी ढफली पर अपना राग सुनाते हैं। 
इसी तरह उनके लिये पप्पू इस्तेमाल किया जाता है। वैसे बच्चे के लिये या बच्चे जैसे के लिये भी यह शब्द होता है। लोग (जिन्हें भक्त कहो या समर्थक) समझते हैं, हमारे महान नेता को पप्पू बनाना जा रहा है। नहीं भैया नहीं । आप यहां लिखने-पढने- बोलने की ही नहीं, समझने की भी गलती कर रहे हैं। आप जानते ही होंगे कि कई जगह कुत्ता को कुता बोला जाता है, पर रहता वह कुत्ता ही है। कई लिख मारते है-वाहऽऽऽ। कई वा करके ही रह जाते हैं। अक्षर कंजूस या मितव्ययी सब जगह होते हैं। फिजूल खर्ची अक्षरों की भी की जाती है। इसी मनोवृत्ति ने उन पपू को पप्पू बना दिया। भक्ति दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इसलिये पप्पू लिखने पर उस बेचारे को निलम्बित कर दिया। पर वास्तव में उसकी मन्शा पपू ही होगी। पर वे भी क्या करें? जब सरकार थी तब बड़े बड़े बाबूओं को सस्पेंड कर - करवा देते थे। अब पार्टी भाइयों को ही सही। अभ्यास रहेगा तो सरकार आने पर इस कला का प्रदर्शन सरकारी क्षेत्र में कर सकेंगे।  
पर यह पपू क्या होता है? शब्द तो पप्पू ही होता है।
नहीं भाई,पार्टीवालो के लिये उनका नेता पपू ही होता है। पपू की फुल फोरम होती है- परम पूज्य।

गोविंद शर्मा,
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया


Thursday, 29 June 2017

लोकमत समाचार में प्रकाशित अपनी एक लघुकथा

Wednesday, 28 June 2017




हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा प्रकाशित मासिक 'हरिगंधा' का जून—17 व्यंग्य विशेषांक आज प्राप्त हुआ है। हरिगंधा की मुख्य संपादक अकादमी की निदेशक श्रीमती कुमुद बंसल है तथा इस अंक के अतिथि संपादक सुपरिचित व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय हैं। विभिन्न पीढियों के पठनीय व्यंग्यों से समाहित यह अंक व्यंग्य का प्रतिनिधि संकलन बन गया है इसमें अपना भी एक शामिल है— प्रेम गली से गुजरते हुए। धन्यवाद कुमुद जी, प्रेम जनमेजय जी।

Monday, 26 June 2017

जो लिख रहा हूं...






बालसाहित्य की धरती
मासिक पत्रिका का यह दूसरा अंक है। संपादक वरिष्ठ बालसाहित्यकार रावेन्द्र कुमार रवि हैं। बालसाहित्य की विभिन्न विधाओं की रोचक सामग्री प्रकाशित हुई है। उल्ले​खनीय है पत्रिका की साज सज्जा,प्रस्तुतिकरण और प्रत्येक रचना से पाठक को जोड़े रखने की कला, विशेषत: बालपाठकों को । हर रचना के साथ आग्रह किया गया है कि आप अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं। संपादकीय 'पूरी किताब हंस रही हैं....' कविता में है। बच्चों की कर्इ जगह भावाभिव्यक्ति है। अपनी भी एक कहानी है— 'मुझे भी बताना'। धन्यवाद रवि जी। संपर्क सूत्र है— 9897614866, dhartee.bsk@gmail.com

Thursday, 22 June 2017

हरिभूमि रो​हतक संस्करण में प्रकाशित अपनी एक व्यंग्य रचना....