Friday, 30 June 2017

व्यंग्य रचना

फेंकू से पप्पू तक

सबद की चोट लगी मोरे मनल में, बेधि गयो तन सारौ.....यह तो संतकवि ने कहा था। वह चोट अध्यात्मिक थी। उससे दर्द नहीं होता, पीड़ा से मुक्ति मिलती है- ऐसा कहना है प्रवचनकर्त्ताओं का। पर अर्थ का अनर्थ तो राजनीतिक करते हैं। महात्मा गांधी को बापू, नेहरू को चाचा, इंदिरा को अम्मा कहने पर उतना लफड़ा नहीं हुआ, जितना उनके वंशज को पप्पू कहने से हुआ। क्योंकि ‘तुम मेरे कुछ भी बोलने के अधिकार का समर्थन करो, मैं तुम्हारे द्वारा अनचाहा बोलने तक मैं तुम्हारे अधिकार का समर्थन करूंगा’ की नीति वाले स्वयं कुछ भी बोल देते हैं और दूसरे के कुछ भी बोल देने पर नाराज हो जाते हैं।
इधर कुछ दिनों से प्रधानमंत्री को फेंकू कहा जा रहा है। इस पर उनके भक्त नाराज भी होते हे। पहले भक्त सिर्फ भगवान के पास होते थे। अब खुद के बंदों को समर्थक तो दूसरे के समर्थकों को भक्त कह दिया जाता है। भक्त हमेशा शब्दार्थ के अल्पज्ञानी होते है। जबकि फेंकू शब्द तो विशेशण, क्रिया, संज्ञा सब कुछ हैं। यह शब्द किसी को यूं ही नहीं  मिलता। बहुत कुछ करना पड़ता है, इसके लिये। वर्षों से सत्ता में जमी पार्टी को उखाड़ फेंकना कोई आसान काम नहीं होता। उखाड़ फेंका तो नाम मिला फेंकू। शुक्र है उखाड़ू , ऊजाड़ू ,बिगाड़ू या पछाड़ू जैसा आडू. नाम नहीं मिला। इसलिये फेंकू से चिढने की जरूरत नहीं। सारे नेता बयानवीर होते है। अपनी ढफली पर अपना राग सुनाते हैं। 
इसी तरह उनके लिये पप्पू इस्तेमाल किया जाता है। वैसे बच्चे के लिये या बच्चे जैसे के लिये भी यह शब्द होता है। लोग (जिन्हें भक्त कहो या समर्थक) समझते हैं, हमारे महान नेता को पप्पू बनाना जा रहा है। नहीं भैया नहीं । आप यहां लिखने-पढने- बोलने की ही नहीं, समझने की भी गलती कर रहे हैं। आप जानते ही होंगे कि कई जगह कुत्ता को कुता बोला जाता है, पर रहता वह कुत्ता ही है। कई लिख मारते है-वाहऽऽऽ। कई वा करके ही रह जाते हैं। अक्षर कंजूस या मितव्ययी सब जगह होते हैं। फिजूल खर्ची अक्षरों की भी की जाती है। इसी मनोवृत्ति ने उन पपू को पप्पू बना दिया। भक्ति दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इसलिये पप्पू लिखने पर उस बेचारे को निलम्बित कर दिया। पर वास्तव में उसकी मन्शा पपू ही होगी। पर वे भी क्या करें? जब सरकार थी तब बड़े बड़े बाबूओं को सस्पेंड कर - करवा देते थे। अब पार्टी भाइयों को ही सही। अभ्यास रहेगा तो सरकार आने पर इस कला का प्रदर्शन सरकारी क्षेत्र में कर सकेंगे।  
पर यह पपू क्या होता है? शब्द तो पप्पू ही होता है।
नहीं भाई,पार्टीवालो के लिये उनका नेता पपू ही होता है। पपू की फुल फोरम होती है- परम पूज्य।

गोविंद शर्मा,
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया


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